परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन: |
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति || 20||
पर:-परे; तस्मात्-उसकी अपेक्षा; तु–लेकिन; भावा:-सृष्टि; अन्य:-दूसरी; अव्यक्त:-अव्यक्त; अव्यक्तात्-अव्यक्त की; सनातनः-शाश्वत; य–जो; सः-वह जो; सर्वेषु-समस्त; भूतेषु-जीवों में; नश्यत्सु-नष्ट होने पर; न कभी नहीं; विनश्यति–विनष्ट होती है।
BG 8.20: व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि से परे एक अव्यक्त सृष्टि है। जब सब कुछ विनष्ट हो जाता है तो भी उसकी सत्ता का विनाश नहीं होता।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन: |
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति || 20||
व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि से परे एक अव्यक्त सृष्टि है। जब सब कुछ विनष्ट हो जाता है तो भी उसकी …
Sign in to save your favorite verses.
Sign InStart your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!
लौकिक संसार और उनके अस्थायित्व पर अपना वक्तव्य समाप्त करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अन्य आध्यात्मिक आयाम की चर्चा करते हैं। यह माया शक्ति की परिधि से परे है और भगवान की योगमाया शक्ति द्वारा उत्पन्न होता है। जब समस्त ब्रह्माण्डों का विनाश हो जाता है तब भी इसका विनाश नहीं होता। श्रीकृष्ण 10वें अध्याय के 42वें श्लोक में उल्लेख करते हैं कि यह आध्यात्मिक आयाम समस्त सृष्टि का तीन चौथाई है जबकि भौतिक संसार एक चौथाई है।